Tuesday, 22 November 2016

रायपुर में विराजते हैं `बीकानेर` के `कोडमदेसर भैरव`

00 सात्विक मदिरा (सोमरस) का लगता है भोग
-रविशंकर शर्मा
रायपुर,(वीएनएस)। राजस्थान के बीकानेर से महज 30 किलोमीटर दूर कोडमदेसर गांव के लाल भैरव यहां राजधानी के बुढ़ापारा स्थित बुढेश्वर महादेव मंदिर में विराजते हैं। इन्हें क्षेत्रपाल के नाम से भी जाना जाता है। क्षेत्रपाल का अर्थ होता है खेत की रक्षा करने वाला। प्रतिवर्ष अगहन माह की अष्टमी को भैरव बाबा का जन्म उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। जिस तरह सोमवार को भोलेनाथ, मंगलवार को हनुमान जी की विशेष पूजा अर्चना होती है ठीक इसी तरह रविवार को भैरव बाबा की पूजा विधान का प्रमुख दिन होता है। बुढ़ेश्वर महादेव में प्रति रविवार विधि-विधान से पूजा की जाती है। मंदिर के प्रभारी राजकुमार व्यास ने वीएनएस से चर्चा में बताया कि भैरव बाबा को सात्विक मदिरा का भोग लगाया जाता है। कल यानी सोमवार को अगहन माह की अष्टमी को मंदिर परिसर में देर रात तक भैरवबाबा का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया।
श्री व्यास ने बताया कि श्री पुष्टिकर ब्राम्हण समाज रायपुर ट्रस्ट के बुढ़ापारा स्थित बुढ़ेश्वर महादेव मंदिर में कोडमदेसर भैरव बाबा का मंदिर 129 वर्ष प्राचीन है। पिछले 50 वर्षों से प्रतिवर्ष अगहन बदी अष्टमी को भैरव जन्मोत्सव यहां धूमधाम से मनाया जा रहा है। इसी तरह प्रति रविवार गोधूली बेला में अर्थात संध्या 6 से 7 बजे के मध्य विशेष पूजा होती है वहीं प्रतिमाह शुक्ल पक्ष की चांदनी चतुर्दशी को विशेष पूजा की जाती है। कल सोमवार को बड़े धूमधाम से सुबह से देर रात तक भैरव जन्माष्टमी उत्सव मनाया गया। दोपहर दो बजे भैरव बाबा का तेल से अभिषेक किया गया। शाम 4 बजे विशेष श्रृंगार हुआ। 5 बजे हवन तथा 6 बजे पूर्णाहुति के पश्चात् प्रसाद वितरण किया गया। प्रसाद में भैरव बाबा को 56 भोग, 32 प्रकार के नमकीन, 21 किलो चूरमा तथा 11 किलो फल का प्रसाद चढ़ाया गया। रात को भक्तों को प्रसादी वितरण की गई जिसमें लगभग 5 हजार भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया। श्री व्यास बताते हैं कि भैरव बाबा का प्रसाद मंदिर प्रागंण के बाहर नहीं जाता, भक्त प्रसाद ग्रहण कर मुंह पानी से साफ कर बाहर निकलते हैं।
00 सात्विक मदिरा (सोमरस) का लगता है भोग
बकौल व्यास भैरव बाबा को मदिरा प्रिय होती है लेकिन यह मदिरा आमलोगों द्वारा ग्रहण करने वाली नहीं होती है। एक सात्विक मदिरा तथा दूसरी तामसिक मदिरा होती है। सात्विक मदिरा का भोग भैरव बाबा को लगाया जाता है। एक तांबे के लौटे में मदिरा तथा कच्चा दूध और गुड़ के मिश्रण से बनी होती है। इस सात्विक मदिरा को पूरा भैरव बाबा के मुखाग्रबिंदु में अर्पित किया जाता है।
00 तेल, सिंदुर और मालीपाना की पोशाक
भैरव बाबा का तेल से अभिषेक किया जाता है। पोशाक स्वरूप सिंदुर का चोला चढ़ाया जाता है। एल्यूमीनियम या चांदी की पतली पन्नी अर्थात अर्क से श्रृंगार किया जाता है। भैरू बाबा का चेहरा कागज से बनाया जाता है। नेत्र, नाक, मुख, मूंछ कागज की कटिंग से बनाई जाती है। भैरव बाबा के मंदिर परिसर में दो त्रिशुल रहता है,एक संहार के लिए तथा दूसरा इनके क्रीड़ा के लिए होता है।
00 बाल (जात) देने के लिए पूर्वजों ने स्थापित किया लिंग
वरिष्ठ ट्रस्टी गोपाल प्रसाद व्यास (78) बताते हैं कि वे अपने बाल्यकाल से यहां कोडमदेसर भैरव बाबा का मंदिर देखते आ रहे हैं। उन्होंने बताया उनके दादा जी के जमाने में भैरव बाबा का लिंग स्वरूप यहां चौकी पर स्थापित किया गया। इनके ऊपर छत नहीं होती है। 2009 में बुढ़ेश्वर महादेव मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ, उस दौरान भैरव बाबा के मंदिर के आस-पास चबुतरे का निर्माण किया गया। बकौल व्यास बीकानेर से विवाह के पश्चात लड़कियों का यहां रायपुर में ससुराल हुआ। बच्चों की जात (बाल) देने अर्थात भैरव बाबा को बाल चढ़ाने बीकानेर जाना होता था, पहले आवागमन के संसाधन कम थे और यात्रा भी लंबी थी, इस कारण कोडमदेसर मंदिर से नारियल लाकर यहां रायपुर में बीकानेर के कोडमदेसर भैरव बाबा का लिंग स्वरूप प्रतिस्थापित किया गया।


Sunday, 13 November 2016

त्यौहार के साथ ही चिकित्सा का महत्व बताती `देवउठनी एकादशी`

रायपुर | 12 नवम्बर 2016 00 बांस की टोकनी में आग लगा ऊपर से कूदने का है प्राचीन लोकाचार
-रविशंकर शर्मा
रायपुर, (वीएनएस)। छत्तीसगढ़ में प्राचीन समय से ही देवउठनी एकादशी पर घर के अनोपयोगी बांस निर्मित टोकनी को अग्नि को समर्पित करने का चलन रहा है। यह परंपरा त्यौहार के साथ-साथ ठंड के अहसास और उसकी तपिश को समझने का एक बहुत अच्छा जरिया है। दीपावली के बाद देवउठनी एकादशी को देवताओं के जागने का पर्व कहा जाता है वहीं एकादशी के तीन दिन बाद अमावस्या को कार्तिक मास का ब्रम्ह मुहुर्त का स्नान संपन्न होता है। लोकमान्यता है कि कार्तिक स्नान करने से विशेष लाभ होता है। साथ ही इसके बाद ठंड लगातार बढ़ती जायेगी। इसके पूर्व ही यह एकादशी जहां हमें ठंड की रूपरेखा तय करा देती हैं तो वहीं अलाव जलाना भी देवउठनी एकादशी की रात बांस की टोकनी जलाने से प्रारंभ होता है।
इस लोकाचार में टोकनी में आग लगाकर जलाना हमें एक तरह से यह संदेश देता है कि आने वाला समय ठंड का है। हमें इसके पहले ही अपने शरीर को स्वस्थ्य बनाये रखने की जरूरत है। हल्की तपिश से शरीर का तापमान बरकरार रखने की आवश्यकता है। पूरे छत्तीसगढ़ में इस लोकाचार की परंपरा को चिकित्सा पद्धति से भी जोड़ कर देखा जाता है। ठंड से बचने के लिए मनुष्य तरह-तरह के उपाय करता है ताकि शरीर का तापमान उचित माप पर बरकरार रहे। दीपावली के बाद से ही मौसम करवट बदलने लगता है। गुलाबी ठंड के अहसास के साथ ही मनुष्य स्वेटर, मफलर, कोट इत्यादि गर्म कपड़े की तैयारी में जुट जाता है। ठंड बढऩे के साथ-साथ मनुष्य अलाव, हीटर आदि का सहारा भी अपने बचाव के लिए करता है।
पंडित भूपेन्द्र तिवारी ने वीएनएस से चर्चा के दौरान बताया कि देवउठनी एकादशी की रात तुलसी विवाह के पश्चात् बांस से निर्मित टोकनी को जलाकर ऊपर से कूदने की प्राचीन भारत में लोकमान्यता रही है। यह लोकाचार है। चूंकि ठंड का आगमन होने वाला है जिसके पीछे यह प्रायोजन है कि शरीर का तापमान बरकरार रहे। साथ ही साथ इस लोकाचार को चिकित्सा पद्धति से भी जोड़कर देखा जाता है। उन्होंने कहा कि निश्चित तौर पर इस लोकाचार के पीछे कोई कारण जरूर है क्योंकि सामान्यत: ठंड के साथ ही हम गर्म स्थान या आग के समीप बैठकर तपिश लेना पसंद करते हैं। लोगों की ऐसी मान्यता को नकारा भी नहीं जा सकता कि टोकनी जलाकर ऊपर से कूदने पर शरीर में होने वाले खाज-खुजली और चर्म संबंधी रोग ठीक हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा बिल्कुल संभव है। आग के समीप बैठने या अलाव से तपिश लेने के दौरान हमारे शरीर की ऊपरी चमड़ी में पनप रहे जीवाणु-विषाणु मर जाते हैं जिससे कि चर्म संबंधी बीमारी होने का खतरा कम रहता है।
00 टोकनी जलाने के पूर्व की जाती है पूजा
राजधानी के लाखेनगर पार्षद गली में देवउठनी एकादशी (तुलसी विवाह) की रात यह लोकाचार देखने को मिला। श्रीमती संगीता शर्मा के साथ मोहल्ले की महिलाएं, बच्चे व युवा उक्त लोकाचार की परंपरा का निर्वहन करने उपस्थित थे। श्रीमती शर्मा ने विधि-विधान से बांस की टोकनी पर कुमकुम हल्दी का तिलक किया। धूप, अगरबत्ती से पूजन पश्चात् भोग लगाया गया। अग्नि का आव्हान कर टोकनी में आग लगाई गई। पहले सभी ने परिक्रमा की, तत्पश्चात तीन बार ऊपर से कूद क र इस लोकाचार को निभाया। श्रीमती संगीता शर्मा ने वीएनएस से चर्चा के दौरान बताया कि वे अपने बाल्यकाल से ही इस लोकाचार की परंपरा को देखते आ रही हैं। प्रतिवर्ष देवउठनी एकादशी की रात इस लोकाचार का आयोजन कर विधि-विधान से पूजन के पश्चात् बांस से बनी टोकनी में आग लगा कूदा जाता है। अग्नि
00 ठीक होती है शरीर की खाज-खुजली
धन्नाबाई शर्मा (65 वर्ष) भी इस लोकाचार की परंपरा को निभाने उपस्थित थीं। उन्होंने भी पूजन के पश्चात् ऊपर से तीन बार निकलकर अग्नि की तपिश ली। उन्होंने चर्चा के दौरान बताया कि ऐसी मान्यता है कि जलती टोकनी के ऊपर से कूदने या उसके समीप रहने से शरीर में होने वाली खाज-खुजली मिट जाती है। शरीर में होने वाली छोटी फुंसियां आदि भी ठीक हो जाती हैं। यह लोकाचार छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि सामान्यत: ठंड के समय हम आग के समीप बैठकर तपिश लेना पसंद करते हैं अत: यह लोकाचार भी इसी मान्यता से ही चला आ रहा है। देव का आव्हान कर ठंड आगमन के पूर्व सभी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है।











Wednesday, 9 November 2016

छोटे बच्चों ने संभाला बड़ों का मंच, दिया स्वच्छता का संदेश

रायपुर | 08 नवम्बर 2016 00 मिसाल बन गया श्री रायपुर पुष्टिकर समाज का दीवाली मिलन
- रविशंकर शर्मा
रायपुर, (वीएनएस)। काबिलियत उम्र की मोहताज नहीं होती। आपमें काबिलियत है तो आपका कद क्या है यह मायने नहीं रखता, आपने क्या किया है यह मायने रखता है। हम अक्सर किसी भी कार्यक्रम में जाते हैं तो सदैव मुख्य और विशिष्ट अतिथि के रूप में समाज के किसी बड़़े ओहदे वाले व्यक्ति या तो विशिष्ठता रखने वाले व्यक्ति को ही स्टेज में देखते हैं और उन्हें सुनते हैं, परंतु राजधानी में दीवाली मिलन का नजारा कुछ ऐसा हो गया कि देखने वाले नजरें जमाएं सिर्फ देखते रहे। कितनों की तो आंखें भर आई। ये कोई फिल्म की कहानी या नाटक का हिस्सा नहीं, बल्कि राजधानी के बुढ़ेश्वर महादेव मंदिर परिसर में श्री रायपुर पुष्टिकर समाज ट्रस्ट द्वारा आयोजित दीपावली मिलन समारोह का नजारा था, जहां मुख्य अतिथि के बतौर कोई वरिष्ठ नहीं बल्कि 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चे मंचासीन रहे। जिसने भी देखा वो भौंचक ही रह गए।
दीपावली मिलन समारोह के मुख्य अतिथि पवन जोशी (10 वर्ष) ने कहा कि वे बड़ा होकर अपनी गायन की प्रतिभा से देश का नाम रोशन करना चाहता हैं। पिता जय किशन जोशी द्वारा विरासत में मिली गायन प्रतिभा के धनी पवन को हारमोनियम और तबला बजाने में भी महारत हासिल है। पवन ने छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के महोत्सव राज्योत्सव में अपने गायन से लोगों के मन को झूमने में मजबूर कर दिया, वहीं हाल ही में नवरात्रि पर्व पर दुर्ग जिले में भजन गायन से उपस्थित भक्तों को भक्तिमय कर दिया।
कार्यक्रम में विशिष्ठ अतिथि के तौर पर कु. परी व्यास (9 वर्ष), आर्यन व्यास (6), आदित्यराज व्यास (6), पीयूष वोरा (12), प्रखर आचार्य (8), कु.सोनल व्यास (7), यश व्यास (9), आदित्य व्यास (12), तनमय पुरोहित (10), कु. वैष्णवी पुरोहित (10), ओजस्वी पुरोहित (11), तनय बिस्सा (10) और कु. अनुष्का (12) उपस्थि थे। ज्ञात हो कि इतनी छोटी उम्र में सभी कुछ न कुछ विशिष्टता रखते हैं। जैसे अनुष्का पहली से 6वीं वर्तमान कक्षा तक 95-98 प्रतिशत के साथ प्रावीण्य सूची में अपना स्थान रखती है। पीयूष को सुंदरकांड व रामायण की लगभग पूरी चौपाई याद है तो आदित्यराज को एकल अभिनय में महारत हासिल है। ऐसे ही सभी एक से बढ़कर एक विशिष्टता रखते हैं।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि पीयूष वोरा (12) ने अपने उद्बोधन में कहा कि मैं भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन से बहुत प्रभावित हूं। हमेशा स्वच्छता की ओर ध्यान देता हूं। अपने आस-पास एवं घर में फैली गंदगी को साफ करता हूं। कार्यक्रम में पीयूष ने सभी को स्वच्छता के लिए प्रेरित किया। इसी तरह परी व्यास (9) ने कहा कि मैं एक लड़की हूं। जहां लोग लड़कियां पैदा होने पर दु:खी हो जाते हैं लेकिन मेरे माता-पिता को भी गर्व है कि मैं उनकी बेटी हूं। आज लड़कियों ने साबित कर दिया कि वे किसी से कम नहीं। परी ने कार्यक्रम में सभी को बता दिया कि वह बड़ी होकर फाइटर प्लेन की उड़ाना चाहती है। शिक्षा, चिकित्सा सहित सभी क्षेत्र में लड़कियां आगे है। इसी तरह सभी विशिष्ठ अतिथियों ने अपना उद्बोधन दिया।
कार्यक्रम के रूपरेखा निर्धारक व सांस्कृतिक गतिविधि प्रभारी ट्रस्टी राजकुमार व्यास ने चर्चा के दौरान बताया कि उन्होंने इस कार्यक्रम की रूपरेखा निर्धारित करते समय बच्चों की प्रतिभा को उभारने तथा समाज के सामने प्रस्तुत करने का उद्देश्य रखा। उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर हम कार्यक्रम के लिए मुख्य अतिथि या विश्ष्टि अतिथि का चुनाव करते समय सदैव विशिष्टता पर ध्यान देते हैं। हमारा यह मानना है कि विशिष्ट अतिथि बनने के लिए विशिष्टता का होना आवश्यक है लेकिन इस कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथियों की यही विशिष्टता थी कि वर्तमान में सभी बच्चे हैं। आगे जाकर यही लोग समाज और देश के लिए विशिष्ट करेंगे। इसलिए इन्हें प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से कार्यक्रम का प्रारूप तय किया गया। श्री व्यास ने बताया कि कार्यक्रम के मुख्य एवं विशिष्ट अतिथि की सूचना किसी को भी नहीं थी, सभी कार्यक्रम के दौरान मंचासीन अतिथियों को देखकर भौंचक से रह गए।
00 सांस्कृतिक संध्या में बांधा शमा
कार्यक्रम में सांस्कृतिक संध्या सहित सभी उपस्थित वर्ग के लिए खेल प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। व्यास ने बताया कि बच्चों ने नृत्य, गायन, काव्य पाठ, मोनो प्ले से शमा बांधा। रामदेव व्यास एंड ग्रुप ने धीमा धीमा उड़ा रे गुलाल...माई तेरी चुंदरी लहरायी... गीत पर रंगा-रंग प्रस्तुति देकर सभी को झूमने के लिए मजबूर कर दिया। महिलाओं, बच्चों, लड़कों व लड़कियों के लिए 1 मिनट गेम्स का आयोजन किया गया।
00 प्रतिभाओं का हुआ सम्मान
श्री रायपुर पुष्टिकर समाज के मुख्य ट्रस्टी गोपाल प्रसाद व्यास ने पूरे समाज को दीपावली की शुभकामना देकर मुख्य एवं विशिष्ट का सम्मान स्मृति चिन्ह प्रदान कर किया। साथ ही समाज से प्रदेश की इकलौती महिला सीए कु. अर्चना व्यास को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में पूर्व सांसद राज्यसभा गोपाल व्यास ने कहा कि आज सांस्कृतिक कार्यक्रमों में पश्चिमी संस्कृति का कब्जा है जिसे दूर कर भारतीय झलक दिखाई देनी चाहिए। ममता ओझा के गणेश वंदना नृत्य से कार्यक्रम की शुरूआत हुई। मंच का संचालन अमृता व्यास, रूपाली पुरोहित व लक्की पुरोहित ने किया। कार्यक्रम की रूपरेखा राजकुमार व्यास ने तय की। कार्यक्रम में आभार प्रबंधक ट्रस्टी कृष्ण कुमार पुरोहित कार्यक्रम में ट्रस्टी तारिणी प्रसाद आचार्य, राजेश व्यास, शंकर व्यास (पार्षद), राजकुमार पुरोहित, शैलेन्द्र कल्ला सहित श्री पुष्टिकर ब्राम्हण समाज के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित थे।