रायपुर | 12 नवम्बर 2016 00 बांस की टोकनी में आग लगा ऊपर से कूदने का है प्राचीन लोकाचार
-रविशंकर शर्मा
रायपुर, (वीएनएस)। छत्तीसगढ़ में प्राचीन समय से ही देवउठनी एकादशी पर घर के अनोपयोगी बांस निर्मित टोकनी को अग्नि को समर्पित करने का चलन रहा है। यह परंपरा त्यौहार के साथ-साथ ठंड के अहसास और उसकी तपिश को समझने का एक बहुत अच्छा जरिया है। दीपावली के बाद देवउठनी एकादशी को देवताओं के जागने का पर्व कहा जाता है वहीं एकादशी के तीन दिन बाद अमावस्या को कार्तिक मास का ब्रम्ह मुहुर्त का स्नान संपन्न होता है। लोकमान्यता है कि कार्तिक स्नान करने से विशेष लाभ होता है। साथ ही इसके बाद ठंड लगातार बढ़ती जायेगी। इसके पूर्व ही यह एकादशी जहां हमें ठंड की रूपरेखा तय करा देती हैं तो वहीं अलाव जलाना भी देवउठनी एकादशी की रात बांस की टोकनी जलाने से प्रारंभ होता है।
इस लोकाचार में टोकनी में आग लगाकर जलाना हमें एक तरह से यह संदेश देता है कि आने वाला समय ठंड का है। हमें इसके पहले ही अपने शरीर को स्वस्थ्य बनाये रखने की जरूरत है। हल्की तपिश से शरीर का तापमान बरकरार रखने की आवश्यकता है। पूरे छत्तीसगढ़ में इस लोकाचार की परंपरा को चिकित्सा पद्धति से भी जोड़ कर देखा जाता है। ठंड से बचने के लिए मनुष्य तरह-तरह के उपाय करता है ताकि शरीर का तापमान उचित माप पर बरकरार रहे। दीपावली के बाद से ही मौसम करवट बदलने लगता है। गुलाबी ठंड के अहसास के साथ ही मनुष्य स्वेटर, मफलर, कोट इत्यादि गर्म कपड़े की तैयारी में जुट जाता है। ठंड बढऩे के साथ-साथ मनुष्य अलाव, हीटर आदि का सहारा भी अपने बचाव के लिए करता है।
पंडित भूपेन्द्र तिवारी ने वीएनएस से चर्चा के दौरान बताया कि देवउठनी एकादशी की रात तुलसी विवाह के पश्चात् बांस से निर्मित टोकनी को जलाकर ऊपर से कूदने की प्राचीन भारत में लोकमान्यता रही है। यह लोकाचार है। चूंकि ठंड का आगमन होने वाला है जिसके पीछे यह प्रायोजन है कि शरीर का तापमान बरकरार रहे। साथ ही साथ इस लोकाचार को चिकित्सा पद्धति से भी जोड़कर देखा जाता है। उन्होंने कहा कि निश्चित तौर पर इस लोकाचार के पीछे कोई कारण जरूर है क्योंकि सामान्यत: ठंड के साथ ही हम गर्म स्थान या आग के समीप बैठकर तपिश लेना पसंद करते हैं। लोगों की ऐसी मान्यता को नकारा भी नहीं जा सकता कि टोकनी जलाकर ऊपर से कूदने पर शरीर में होने वाले खाज-खुजली और चर्म संबंधी रोग ठीक हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा बिल्कुल संभव है। आग के समीप बैठने या अलाव से तपिश लेने के दौरान हमारे शरीर की ऊपरी चमड़ी में पनप रहे जीवाणु-विषाणु मर जाते हैं जिससे कि चर्म संबंधी बीमारी होने का खतरा कम रहता है।
00 टोकनी जलाने के पूर्व की जाती है पूजा
राजधानी के लाखेनगर पार्षद गली में देवउठनी एकादशी (तुलसी विवाह) की रात यह लोकाचार देखने को मिला। श्रीमती संगीता शर्मा के साथ मोहल्ले की महिलाएं, बच्चे व युवा उक्त लोकाचार की परंपरा का निर्वहन करने उपस्थित थे। श्रीमती शर्मा ने विधि-विधान से बांस की टोकनी पर कुमकुम हल्दी का तिलक किया। धूप, अगरबत्ती से पूजन पश्चात् भोग लगाया गया। अग्नि का आव्हान कर टोकनी में आग लगाई गई। पहले सभी ने परिक्रमा की, तत्पश्चात तीन बार ऊपर से कूद क र इस लोकाचार को निभाया। श्रीमती संगीता शर्मा ने वीएनएस से चर्चा के दौरान बताया कि वे अपने बाल्यकाल से ही इस लोकाचार की परंपरा को देखते आ रही हैं। प्रतिवर्ष देवउठनी एकादशी की रात इस लोकाचार का आयोजन कर विधि-विधान से पूजन के पश्चात् बांस से बनी टोकनी में आग लगा कूदा जाता है। अग्नि
00 ठीक होती है शरीर की खाज-खुजली
धन्नाबाई शर्मा (65 वर्ष) भी इस लोकाचार की परंपरा को निभाने उपस्थित थीं। उन्होंने भी पूजन के पश्चात् ऊपर से तीन बार निकलकर अग्नि की तपिश ली। उन्होंने चर्चा के दौरान बताया कि ऐसी मान्यता है कि जलती टोकनी के ऊपर से कूदने या उसके समीप रहने से शरीर में होने वाली खाज-खुजली मिट जाती है। शरीर में होने वाली छोटी फुंसियां आदि भी ठीक हो जाती हैं। यह लोकाचार छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि सामान्यत: ठंड के समय हम आग के समीप बैठकर तपिश लेना पसंद करते हैं अत: यह लोकाचार भी इसी मान्यता से ही चला आ रहा है। देव का आव्हान कर ठंड आगमन के पूर्व सभी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है।
-रविशंकर शर्मा
रायपुर, (वीएनएस)। छत्तीसगढ़ में प्राचीन समय से ही देवउठनी एकादशी पर घर के अनोपयोगी बांस निर्मित टोकनी को अग्नि को समर्पित करने का चलन रहा है। यह परंपरा त्यौहार के साथ-साथ ठंड के अहसास और उसकी तपिश को समझने का एक बहुत अच्छा जरिया है। दीपावली के बाद देवउठनी एकादशी को देवताओं के जागने का पर्व कहा जाता है वहीं एकादशी के तीन दिन बाद अमावस्या को कार्तिक मास का ब्रम्ह मुहुर्त का स्नान संपन्न होता है। लोकमान्यता है कि कार्तिक स्नान करने से विशेष लाभ होता है। साथ ही इसके बाद ठंड लगातार बढ़ती जायेगी। इसके पूर्व ही यह एकादशी जहां हमें ठंड की रूपरेखा तय करा देती हैं तो वहीं अलाव जलाना भी देवउठनी एकादशी की रात बांस की टोकनी जलाने से प्रारंभ होता है।
इस लोकाचार में टोकनी में आग लगाकर जलाना हमें एक तरह से यह संदेश देता है कि आने वाला समय ठंड का है। हमें इसके पहले ही अपने शरीर को स्वस्थ्य बनाये रखने की जरूरत है। हल्की तपिश से शरीर का तापमान बरकरार रखने की आवश्यकता है। पूरे छत्तीसगढ़ में इस लोकाचार की परंपरा को चिकित्सा पद्धति से भी जोड़ कर देखा जाता है। ठंड से बचने के लिए मनुष्य तरह-तरह के उपाय करता है ताकि शरीर का तापमान उचित माप पर बरकरार रहे। दीपावली के बाद से ही मौसम करवट बदलने लगता है। गुलाबी ठंड के अहसास के साथ ही मनुष्य स्वेटर, मफलर, कोट इत्यादि गर्म कपड़े की तैयारी में जुट जाता है। ठंड बढऩे के साथ-साथ मनुष्य अलाव, हीटर आदि का सहारा भी अपने बचाव के लिए करता है।
पंडित भूपेन्द्र तिवारी ने वीएनएस से चर्चा के दौरान बताया कि देवउठनी एकादशी की रात तुलसी विवाह के पश्चात् बांस से निर्मित टोकनी को जलाकर ऊपर से कूदने की प्राचीन भारत में लोकमान्यता रही है। यह लोकाचार है। चूंकि ठंड का आगमन होने वाला है जिसके पीछे यह प्रायोजन है कि शरीर का तापमान बरकरार रहे। साथ ही साथ इस लोकाचार को चिकित्सा पद्धति से भी जोड़कर देखा जाता है। उन्होंने कहा कि निश्चित तौर पर इस लोकाचार के पीछे कोई कारण जरूर है क्योंकि सामान्यत: ठंड के साथ ही हम गर्म स्थान या आग के समीप बैठकर तपिश लेना पसंद करते हैं। लोगों की ऐसी मान्यता को नकारा भी नहीं जा सकता कि टोकनी जलाकर ऊपर से कूदने पर शरीर में होने वाले खाज-खुजली और चर्म संबंधी रोग ठीक हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा बिल्कुल संभव है। आग के समीप बैठने या अलाव से तपिश लेने के दौरान हमारे शरीर की ऊपरी चमड़ी में पनप रहे जीवाणु-विषाणु मर जाते हैं जिससे कि चर्म संबंधी बीमारी होने का खतरा कम रहता है।
00 टोकनी जलाने के पूर्व की जाती है पूजा
राजधानी के लाखेनगर पार्षद गली में देवउठनी एकादशी (तुलसी विवाह) की रात यह लोकाचार देखने को मिला। श्रीमती संगीता शर्मा के साथ मोहल्ले की महिलाएं, बच्चे व युवा उक्त लोकाचार की परंपरा का निर्वहन करने उपस्थित थे। श्रीमती शर्मा ने विधि-विधान से बांस की टोकनी पर कुमकुम हल्दी का तिलक किया। धूप, अगरबत्ती से पूजन पश्चात् भोग लगाया गया। अग्नि का आव्हान कर टोकनी में आग लगाई गई। पहले सभी ने परिक्रमा की, तत्पश्चात तीन बार ऊपर से कूद क र इस लोकाचार को निभाया। श्रीमती संगीता शर्मा ने वीएनएस से चर्चा के दौरान बताया कि वे अपने बाल्यकाल से ही इस लोकाचार की परंपरा को देखते आ रही हैं। प्रतिवर्ष देवउठनी एकादशी की रात इस लोकाचार का आयोजन कर विधि-विधान से पूजन के पश्चात् बांस से बनी टोकनी में आग लगा कूदा जाता है। अग्नि
00 ठीक होती है शरीर की खाज-खुजली
धन्नाबाई शर्मा (65 वर्ष) भी इस लोकाचार की परंपरा को निभाने उपस्थित थीं। उन्होंने भी पूजन के पश्चात् ऊपर से तीन बार निकलकर अग्नि की तपिश ली। उन्होंने चर्चा के दौरान बताया कि ऐसी मान्यता है कि जलती टोकनी के ऊपर से कूदने या उसके समीप रहने से शरीर में होने वाली खाज-खुजली मिट जाती है। शरीर में होने वाली छोटी फुंसियां आदि भी ठीक हो जाती हैं। यह लोकाचार छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि सामान्यत: ठंड के समय हम आग के समीप बैठकर तपिश लेना पसंद करते हैं अत: यह लोकाचार भी इसी मान्यता से ही चला आ रहा है। देव का आव्हान कर ठंड आगमन के पूर्व सभी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है।




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