रायपुर | 28 अक्टूबर 2016 00 मनुष्य और सुआ समझते हैं एक-दूसरे की बात : कमला
-रविशंकर शर्मा
रायपुर, (वीएनएस)। चलो मन बंसरी बजावे जिहां मोहना रे...राधा रानी नाचे ठुमा ठुम...रास रचावे जिहां गोकुल गुवाला रे....मिरदंग बाजे धुमा धुम...मोर सुवा ना मिरदंग बाजे धुमा-धुम....तरी हरी नहा ना रे, नाना मोर सुवा ना.....तरी हरी नाना रे नाना...। ये गीत की पंक्तियां कानों में पड़ते ही आंखों के सामने दृश्य उकर जाता है। बांस की बनी टोकरी में मिट्टी का बना सुआ और इर्द-गिर्द महिलाओं या युवतियों का समूह सुआ गीत का गायन कर पारंपरिक नृत्य करते दिखाई देता हैं। कुछ इसी तरह का दृश्य राजधानी के चौक-चौराहों, मोहल्लों व गलियों में इन दिनों दिखाई दे रहा है। पारंपरिक सुआ नृत्य करने इन दिनों छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले की तहसील गंडई से 7 महिलाओं की टोली राजधानी रायपुर पहुंची है। कई वर्षों से ये टोली पूरे 15 दिन रायपुर में ही ठहरकर गली-मोहल्लों में सुआ नृत्य कर चंदा जमा करती है। ग्रुप की मुख्या श्रीमती कमला ने वीएनएस से चर्चा के दौरान सुआ नृत्य की परंपरा की जानकारी दी।
श्रीमकी कमला ने कहा कि कई वर्षों से वे लोग राजधानी आ रहे हैं। यहां 17 दिन रूककर राजधानी की गली-मोहल्लों, संस्थानों में सुआ नृत्य कर चंदा जमा करते हैं। उन्होंने बताया कि प्रतिवर्ष शहर के रामसागरपारा स्थित करोड़ीमल धर्मशाला के पीछे एक परिचित द्वारा ठहरने की व्यवस्था की जाती है। प्रतिवर्ष दशहरा के दो दिन पूर्व गंडई से रायपुर पहुंचते हैं और दीपावली के दिन सुबह सभी अपने गृहग्राम गंडई के लिए रवाना हो जाते हैं। श्रीमती कमला ने बताया कि टोली में श्रीमती सुजाता, श्रीमती निर्मला, श्रीमती विमला,श्रीमती ममता, श्रीमती राखी सहित 1 अन्य साथी श्रीमती शर्मा शामिल है। सभी गंडई के रहवासी हैं।
00 तो इसलिए रखते हैं सुआ
श्रीमती कमला के अनुसार सुआ हरियाली का प्रतीक है। पक्षियों में सुआ ही एक ऐसा है जो मनुष्य द्वारा सिखाई बातों को बोल सकता है। सुआ और मनुष्य का साथ बहुत करीब का है। इसलिए बांस की टोकरी में सुआ रखते हैं। साथ ही एक पौराणिक कथा से भी परिचय कराते हुए श्रीमती कमला ने बताया कि भगवान शंकर और माता पार्वती से भी सुआ का जुड़ाव है। उन्होंने कहा कि एक बार शंकर जब माता पार्वती को कुछ गोपनीय बात बता रहे थे तो सुआ ने पूरी बात सुन ली थी और दोहराने लगा तो भगवान शंकर ने उसका पीछा किया, लेकिन वह पकड़ से दूर था। किसी तरह हाथ में आए सुआ को भगवान शंकर ने पिंजरे में कैद कर लिया ताकि वह भेद नहीं खोल सके। बहरहाल सुआ की करूण पुकार सुनकर भोलेनाथ ने उसे अभयदान दिया। जिसके बाद सुआ ने किसी को भेद नहीं बताया और उनके करीब हो गया। इस कारण सुआ को टोकरी में रखकर सुआ गीत गाया जाता है।
00 तो इस लिए सुआ गीत का गायन
उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में दीपावली के दिन गौरी-गौरा के रूप में भगवान शंकर और माता पार्वती का विवाह किया जाता है। जिस तरह विवाह में विवाह के गीत का गायन होता है ठीक उसी तरह छत्तीसगढ़ में गौरी-गौरा के विवाह के पूर्व सुआ गीत का गायन किया जाता है। इस गीत का गायन तथा सुआ नृत्य कर समूह की महिलाएं चंदा जमा करती है और दीपावली के दिन अपने गृहग्राम लौटकर गौरी-गौरा की विवाह धूमधाम से किया जाता है। गृहग्राम में गौरी-गौरा चौरा बना हुआ है जहां सारी परंपरा के अनुसार गाजे-बाजे के साथ गौरी-गौरा का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। कुम्हार के घर से उन्हार(मिट्टी के चौकी पर चढ़ी रंग-बिरंगी पन्नी) लाकर सजाया जाता है। दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा के दिन जंवारा विसर्जन किया जाता है।
00 छत्तीसगढ़ के लोकगीत में विविधता
छत्तीसगढ़ी लोकभाषा में गीतों की परंपरा है। छत्तीसगढ़ के प्रमुख और लोकप्रिय गीत सुआगीत, ददरिया, करमा, डण्डा, फ ाग, चनौनी, बांस गीत, राउत गीत, पंथी गीत आदि का समय-समय पर विशेष अवसर पर गायन किया जाता है। सुआ गीत करुणा का प्रतीक है। इसे विशेषकर गोंड जाति की नारियां दीपावली पर्व पर आंगन के बीच में पिंजरे में बंद हुआ सुआ को प्रतीक बनाकर (मिट्टी का तोता) उसके चारो ओर गोलाकार वृत्त में नृत्य करती है लेकिन अब छत्तीसगढ़ के सभी स्थानों में दशहरा और दीपावली के मध्य सुआ नृत्य की प्रथा विस्तारित हो चुकी है। महिलाओं और युवतियों की टोली सुआ नृत्य करते इन दिनों हर जगह दिखाई देती है।
-रविशंकर शर्मा
रायपुर, (वीएनएस)। चलो मन बंसरी बजावे जिहां मोहना रे...राधा रानी नाचे ठुमा ठुम...रास रचावे जिहां गोकुल गुवाला रे....मिरदंग बाजे धुमा धुम...मोर सुवा ना मिरदंग बाजे धुमा-धुम....तरी हरी नहा ना रे, नाना मोर सुवा ना.....तरी हरी नाना रे नाना...। ये गीत की पंक्तियां कानों में पड़ते ही आंखों के सामने दृश्य उकर जाता है। बांस की बनी टोकरी में मिट्टी का बना सुआ और इर्द-गिर्द महिलाओं या युवतियों का समूह सुआ गीत का गायन कर पारंपरिक नृत्य करते दिखाई देता हैं। कुछ इसी तरह का दृश्य राजधानी के चौक-चौराहों, मोहल्लों व गलियों में इन दिनों दिखाई दे रहा है। पारंपरिक सुआ नृत्य करने इन दिनों छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले की तहसील गंडई से 7 महिलाओं की टोली राजधानी रायपुर पहुंची है। कई वर्षों से ये टोली पूरे 15 दिन रायपुर में ही ठहरकर गली-मोहल्लों में सुआ नृत्य कर चंदा जमा करती है। ग्रुप की मुख्या श्रीमती कमला ने वीएनएस से चर्चा के दौरान सुआ नृत्य की परंपरा की जानकारी दी।
श्रीमकी कमला ने कहा कि कई वर्षों से वे लोग राजधानी आ रहे हैं। यहां 17 दिन रूककर राजधानी की गली-मोहल्लों, संस्थानों में सुआ नृत्य कर चंदा जमा करते हैं। उन्होंने बताया कि प्रतिवर्ष शहर के रामसागरपारा स्थित करोड़ीमल धर्मशाला के पीछे एक परिचित द्वारा ठहरने की व्यवस्था की जाती है। प्रतिवर्ष दशहरा के दो दिन पूर्व गंडई से रायपुर पहुंचते हैं और दीपावली के दिन सुबह सभी अपने गृहग्राम गंडई के लिए रवाना हो जाते हैं। श्रीमती कमला ने बताया कि टोली में श्रीमती सुजाता, श्रीमती निर्मला, श्रीमती विमला,श्रीमती ममता, श्रीमती राखी सहित 1 अन्य साथी श्रीमती शर्मा शामिल है। सभी गंडई के रहवासी हैं।
00 तो इसलिए रखते हैं सुआ
श्रीमती कमला के अनुसार सुआ हरियाली का प्रतीक है। पक्षियों में सुआ ही एक ऐसा है जो मनुष्य द्वारा सिखाई बातों को बोल सकता है। सुआ और मनुष्य का साथ बहुत करीब का है। इसलिए बांस की टोकरी में सुआ रखते हैं। साथ ही एक पौराणिक कथा से भी परिचय कराते हुए श्रीमती कमला ने बताया कि भगवान शंकर और माता पार्वती से भी सुआ का जुड़ाव है। उन्होंने कहा कि एक बार शंकर जब माता पार्वती को कुछ गोपनीय बात बता रहे थे तो सुआ ने पूरी बात सुन ली थी और दोहराने लगा तो भगवान शंकर ने उसका पीछा किया, लेकिन वह पकड़ से दूर था। किसी तरह हाथ में आए सुआ को भगवान शंकर ने पिंजरे में कैद कर लिया ताकि वह भेद नहीं खोल सके। बहरहाल सुआ की करूण पुकार सुनकर भोलेनाथ ने उसे अभयदान दिया। जिसके बाद सुआ ने किसी को भेद नहीं बताया और उनके करीब हो गया। इस कारण सुआ को टोकरी में रखकर सुआ गीत गाया जाता है।
00 तो इस लिए सुआ गीत का गायन
उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में दीपावली के दिन गौरी-गौरा के रूप में भगवान शंकर और माता पार्वती का विवाह किया जाता है। जिस तरह विवाह में विवाह के गीत का गायन होता है ठीक उसी तरह छत्तीसगढ़ में गौरी-गौरा के विवाह के पूर्व सुआ गीत का गायन किया जाता है। इस गीत का गायन तथा सुआ नृत्य कर समूह की महिलाएं चंदा जमा करती है और दीपावली के दिन अपने गृहग्राम लौटकर गौरी-गौरा की विवाह धूमधाम से किया जाता है। गृहग्राम में गौरी-गौरा चौरा बना हुआ है जहां सारी परंपरा के अनुसार गाजे-बाजे के साथ गौरी-गौरा का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। कुम्हार के घर से उन्हार(मिट्टी के चौकी पर चढ़ी रंग-बिरंगी पन्नी) लाकर सजाया जाता है। दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा के दिन जंवारा विसर्जन किया जाता है।
00 छत्तीसगढ़ के लोकगीत में विविधता
छत्तीसगढ़ी लोकभाषा में गीतों की परंपरा है। छत्तीसगढ़ के प्रमुख और लोकप्रिय गीत सुआगीत, ददरिया, करमा, डण्डा, फ ाग, चनौनी, बांस गीत, राउत गीत, पंथी गीत आदि का समय-समय पर विशेष अवसर पर गायन किया जाता है। सुआ गीत करुणा का प्रतीक है। इसे विशेषकर गोंड जाति की नारियां दीपावली पर्व पर आंगन के बीच में पिंजरे में बंद हुआ सुआ को प्रतीक बनाकर (मिट्टी का तोता) उसके चारो ओर गोलाकार वृत्त में नृत्य करती है लेकिन अब छत्तीसगढ़ के सभी स्थानों में दशहरा और दीपावली के मध्य सुआ नृत्य की प्रथा विस्तारित हो चुकी है। महिलाओं और युवतियों की टोली सुआ नृत्य करते इन दिनों हर जगह दिखाई देती है।


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